मैंने शायद तुम्हे पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें , पहले भी कहीं देखा है मैंने शायद तुम्हें , मैंने शायद तुम्हें , पहले भी कहीं देखा है मैंने शायद तुम्हें , अजनबी सी हो , मगर गैर नहीं लगती हो वहम से भी , जो हो नाज़ुक , वो यकीं लगती हो हाय ये फूल सा , चेहरा ये घनेरी ज़ुल्फ़ें मेरे शेरों से भी तुम , मुझको हंसीं लगती हो मैंने शायद तुम्हें , देखकर तुमको , किसी रात की याद आती है एक ख़ामोश , मुलाक़ात की याद आती है जहन में हुस्न की , ठंडक का असर जागता है आंच देती हुई , बरसात की याद ...