मैंने शायद तुम्हे पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
अजनबी सी हो, मगर गैर नहीं लगती हो
वहम से भी, जो हो नाज़ुक, वो यकीं लगती हो
हाय ये फूल सा, चेहरा ये घनेरी ज़ुल्फ़ें
मेरे शेरों से भी तुम, मुझको हंसीं लगती हो
मैंने शायद तुम्हें,
देखकर तुमको, किसी रात की याद आती है
एक ख़ामोश, मुलाक़ात की याद आती है
जहन में हुस्न की, ठंडक का असर जागता है
आंच देती हुई, बरसात की याद आती है
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
जिसकी पलकें, मेरी आँखों पे झुकी रहती हैं
तुम वही मेरे, ख़यालों की परी हो की नहीं
कहीं पहले की तरह, फिर तो न खो जाओगी
जो हमेशा के लिये हो, वो खुशी हो की नहीं
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
अजनबी सी हो, मगर गैर नहीं लगती हो
वहम से भी, जो हो नाज़ुक, वो यकीं लगती हो
हाय ये फूल सा, चेहरा ये घनेरी ज़ुल्फ़ें
मेरे शेरों से भी तुम, मुझको हंसीं लगती हो
मैंने शायद तुम्हें,
देखकर तुमको, किसी रात की याद आती है
एक ख़ामोश, मुलाक़ात की याद आती है
जहन में हुस्न की, ठंडक का असर जागता है
आंच देती हुई, बरसात की याद आती है
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
जिसकी पलकें, मेरी आँखों पे झुकी रहती हैं
तुम वही मेरे, ख़यालों की परी हो की नहीं
कहीं पहले की तरह, फिर तो न खो जाओगी
जो हमेशा के लिये हो, वो खुशी हो की नहीं
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
मैंने शायद तुम्हें, पहले भी कहीं देखा है
मैंने शायद तुम्हें,
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