मैं कहीं कवि न बन जाऊँ तेरे प्यार में कविता
मैं कहीं कवि
न बन जाऊँ तेरे प्यार में कविता-2
तुझे दिल के आइने में मैं ने बार बार देखा
तेरी अखियों
में देखा तो छलकता प्यार देखा
तेरा दर्द
मैं ने देखा तो जिगर के पार देखा
मैं कहीं कवि
न बन जाऊँ ...
तेरा
रंग है सलोना तेरे
अंग में लचक है
तेरी बात में
है जादू तेरे बोल में खनक है
तेरी हर अदा
मुहब्बत तू ज़मीन की धनक है
मैं कहीं कवि
न बन जाऊँ ...
मेरा
दिल लुभा रहा है
तेरा रूप सादा सादा
ये झुकी झुकी
निगाहें करे प्यार और ज्यादा
मैं तुझी पे
जान दूँगा, है यही मेरा इरादा
मैं कहीं कवि
न बन जाऊँ ...
Comments
Post a Comment