न तू ज़मीं के लिए, है न आसमां के लिए

न तू ज़मीं के लिए, है न आसमां के लिए
तेरा वजूद है, अब दास्ताँ के लिए

पलट के सु-ए-चमन, देखने से क्या होगा
वो शाख ही ना रही, जो थी आशियाँ के लिए
ना तू ज़मीं...

गरज परस्त जहां में, वफ़ा तलाश न कर
ये शय बनी थी किसी, दूसरे जहां के लिए
तेरा वजूद...

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